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Friday, February 8, 2013

जब लाशों ने बातें की!

साभार - tom moore  illustration .कॉम 
वैश्विक कोलाहल से दूर भूतल के किसी कोने में,
कुछ लाशें आस पास बैठी हुई हैं.
बुर्के में ढकी गोधरा वाली लाश, मटमैले लुंगी में लिपटी मेरठ वाली लाश से नजरें चुरा रही है.
भारतीय लाशें संस्कारी जो होती हैं..मर के भी औरत-मरद से पर्दा करना नहीं भूलती.
पास ही में कुछ रुसी लाशें है, स्टालिन की शिकार लाशें..जो अब भी समाजवाद के नगमे दुहरा रही हैं.
बगल वाली चट्टान पर कुछ फिलिस्तीनी लाशें हैं..जिन्हें ये सब कर्कश सुनाई दे रहा है.... इसमें थोडा कसूर इसरेली बमों का भी है..संगीत पर से इनका भरोसा उसने ही उठाया है.
कुछ लाशें फटी पुरानी धोतियों में भी हैं- यह भागलपुरी मुस्लिमों, बथानी टोला के मुसहरों और जहानाबाद के खेतिहर भूमिहारों की लाशें है.
लाश बन कर भी इनकी तलब नहीं गयी- लिहाज़ा यह चिलम फूंक रही है..फरक सिर्फ इतना है आज तलब के दरम्यान जातें नहीं, सिर्फ तलब है.
रुसी लाशें को इन्होने पहले सिर्फ अखबारों में देखा था कभी..फिलिस्तीनी लाशें को भी शायद.
आज आमने-सामने होने पे इन्हें उनपे हँसी आ रही है...वे बेहद मजाकिया हैं..
रूसियों का चीखना और फिलिस्तीनी लाशों का कान बंद करना- बेहद अजीब लगता है इन लाशों को.
इन बिहारी लाशों के चिलम का धुआं पास बैठी मुम्बईया लाश की आँखों को नहीं सुहा रहा- इस लाश को आग देने वक़्त बाल ठाकरे भी खड़ा था.
यह मुंबई धमाकों में निर्मित लाश - एक सी.ई.ओ. की लाश है-मल्टी-नेशनल लाश!
इसके ख्यालों में अब भी नीचे का शेयर बाजार है. यह लाश अब भी बिहारियों से घृणा करती है.

इन लाशों में कुछ सम्मानित लाशें भी हैं. सिगार फूंकते जिन्ना की, भूली सी नज़्म याद करते ग़ालिब की,
दरख्तों के पीछे छिपे डरे सहमे गाँधी की, इधर से उधर दौड़ते -कूदते लेनिन की.!
ग़ालिब चुप हैं. जिन्ना का सिगार गुडगुडा रहा है. जिन्ना ने ग़ालिब को कहीं देखा है....शायद हिंदुस्तान में!
लेनिन गाँधी को दरख्तों के दामन से बहार खींच लाते है!
सम्मानित लाशें ने आम सी इन लाशों को कभी भी नहीं देखा!
लाशें अब भी इन्हें पहचानती हैं.
गोधरा वाली आंटी ने जिन्ना की तस्वीर अपने अब्बू के कमरे में टँगी देखी थी.
मेरठ वाले हिन्दू को ग़ालिब के नगमों का बड़ा शौक था.
दरख्तों के दामन से लेनिन वाली लाश गाँधी को खींच कर इन सब के बीच लाती है.
गाँधी बच्चों की तरह रोये जा रहा है. लेनिन जिन्ना की सिगार मांगने की सोच रहा है.
भागलपुर, बथानी टोला और जहानाबाद वाली लाशें चिलम छोड़ गाँधी की और दौड़ लगाती हैं.
गाँधी रोते हुए भागता है ..डरता है क्यूंकि उनके सवालों का जवाब नहीं होगा उसके पास.
रुसी लाशें भी अपने लेनिन को काँधे पर उठाना चाहती है, पर लेनिन चुप चाप चिलम फूंक रहा है - जिन्ना ने उसे अपनी सिगार नहीं दी...उसने किसी को कुछ नहीं दिया है अपना..सिवाय पाकिस्तान के!
मल्टी-नेशनल लाश को गाँधी का दौड़ना और दौड़ के फिसलना बड़ा अच्छा लगता है...वो खूब जोर से हँसता है.
ग़ालिब उसे चुप करना चाहता तो है..पर उसे अंग्रेजी नहीं उर्दू आती है!!!!
बम्बईया लाश का हँसना न मेरठ वाले भैया को सुहाता है, न इन बिहारी लाशों को.
लाशों के बीच आज फिर शायद लाशें गिरने वाली है.
गाँधी पे ठहाका लगाने की हिम्मत कैसे हुई...लाशें वर्ग विभेद नहीं देखती.
कुछ लाशें फिर से हिन्दुस्तानी बन जाती है......गोधरा वाली आंटी भी मारने को उठती है...जिन्ना उन्हें इशारों में रोकता है.
वे ठिठकती है...फिर रुक ही जाती है. बहुत थक भी चुकी हैं वो.
बहरहाल, गाँधी पे हँसने वाली लाश फिर से मरने वाली है..लाशों के बीच फिर से दंगा छिड़ने लगता है.
रुसी लाशें भी नेहरु के रूस से मैत्रीपूर्ण संबंधों के सम्मान में, कूद पड़ती है दंगल में!
जिन्ना सिगार फूंकता हुआ, फिलिस्तीनी लाशों के कानों में कुछ फूंकता है.
वे उठ जाती है.
पल भर का उन्माद ---मरने-मरने की वही पुरानी कवायद शुरू हो गयी है.
लाशें अब फिर से लाशें हैं.
गांधी अपनी धोती संभालता फिर से रो रहा है.
लेनिन चिलम में कोयला धौंकने की असफल कोशिश कर रहा है.
ग़ालिब अब भी माज़रा समझने की कोशिश ही कर रहा है, जफ़र के ज़माने में भी लाशें ऐसे ही गिरी थी!
जिन्ना अब भी सिगार फूंके जा रहा है....ठीक वैसे ही जैसे उसने ४७ के दंगों के दरम्यान फूंका था.!!!